हिन्दी सिनेमा के इतिहास की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों पर जब कभी भी बात की जाएगी तो तमाम फ़िल्मों के साथ सन् 1975 में आई 'रमेश सिप्पी की शोले' का नाम ज़रूर आएगा क्योंकि शोले के अभाव में तो हिन्दी सिनेमा के इतिहास पर बात हो ही नहीं सकती। इस फ़िल्म में मनोरंजन के ऐसे शानदार आयाम है कि आज भी लोग इसे बहुत ही चाॅव के साथ देखते है फिर चाहे वह बंसती रूपी, सुरमा भोपाली रूपी, जेलर रूपी या फिर वीरू रूपी चंचलता हो या राधा, रामलाल या फिर जय जैसी गंभीरता हो और प्रतिशोध की आग चाहे गब्बर जैसी हो या ठाकुर ऐसी आदि पात्र शोले को हिन्दी सिनेमा मे एक महान् कृति बना देते है। बात यदि शोले की कहानी पर की जाए तो इसकी बहुत ही साधारण है यह एक रेवेन्ज स्टोरी है जिसमे एक पूर्व पुलिस इंसपेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह एक ख़तरनाक डाकू गब्बर सिंह को ज़िन्दा पकड़वाकर उससे बदला लेना चाहता है। अपने मक़सद को पूरा करने के लिए वह जय-वीरू नाम के दो चोर-बदमाशों का इस्तेमाल करता है क्योंकि एक बार ठाकुर ट्रेन में उनकी वीरता और उनके अन्दर छुपी हुई इन्सानियत को देख चुका था। कहानी इतनी ही है और चूंकि शोले एक फ़ीचर फ़िल्म है जिसका काम दर्शको का मनोरंजन करना है तो उसमे कुछ अन्य चीज़े भी शामिल की गयी जैसे जय, अनवर की मौत , वीरू के ड्रामें,गाने आदि लेकिन इस मनोरंजक फ़िल्म ने सोसायटी के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल छोड़ा। सवाल यह है कि ठाकुर बलदेव सिंह जो कि अपने दौर में एक बहादुर, ईमानदाए पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर रह चुका है उसने अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए जय और वीरू को ही इस क़ाबिल क्यों समझा? जबकि ठाकुर साहब यह बात बहुत अच्छी तरह से जानते है कि वह दोनों चोर-बदमाश है और पुलिस एंव बदमाशो का हाल कृष्ण और कंस जैसा है फिर भी ठाकुर साहब ने जय-वीरू को चुना। पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह का यह फ़ैसला इस बात का पक्का सबूत है कि ठाकुर को यह बहुत अच्छी तरह से पता है कि पुलिस उनके किसी काम नहीं आ सकती। एक और नज़रिये से देखा जाए तो शोलेे ने सम्पूर्ण पुलिस व्यवस्था को ही कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है कि जो पुलिस अपने ही एक आदमी की सहायता नहीं कर सकती वह दूसरों की मदद कैसे करेगी? यदि पुलिस अपनी ज़िम्मेदारियों का सही से निर्वाह करती तो क्या ठाकुर जय-वीरू का इस्तेमाल करते! इससे हटकर बात यदि आज के दौर की पुलिस व्यवस्था पर की जाए तो कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है और इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्दालय के उस छात्र का न मिलना है जिसे पुलिस तीन महीनों से भी अधिक वक़्त से ढूंढ रही है। इसके विपरीत एक और ताज्जुबख़ेज़ घटना सामने आती है कि देश की एक प्रतिष्ठित जेल से अपराधी फ़रार होते है और पुलिस कुछ ही घंटो में उन्हें ढूंढकर उनका एनकाउंटर भी कर देती है पता नहीं यहाँ पर पुलिस कैसे इतना अच्छा प्रदर्शन कर देती है और दूसरी जगह उसे तीन महीनों की मेहनत के बाद भी सफ़लता नहीं मिल रही है। अब जब ऐसी घटनाए सोसायटी सामने आएंगी तो पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठना तो वाजिब हो ही जाएगा। बसंती के शब्दो में समझने वाली बात यह है कि शोले ने 1975ईसवी में ही पुलिस की हालत को समाज के सामने रख दिया था कि जब उस वक़्त पुलिस ऐसी थी तो आज अगर उसकी कार्यशैली पर सवाल उठ रहें है तो कौन सी बड़ी बात है क्योंकि दिखता तो यही है कि पुलिस सिर्फ़ कमज़ोर लोगो से बहुत चढ़ कर बात करती है और कोई उससे इक्किस पड़ गया तो पीछे गाली और सामने सर-सर के अलावा कुछ नहीं करती। इसके साथ सत्ता पक्ष पर तो बहुत अधिक महरबान रहती है। यही प्रमुख वजह है जिससे आज भी लोगो की नज़रो में पुलिस की वह अाहमियत नहीं है जो हक़ीक़त में होनी चाहिए क्योंकि क़ानूनन एंव पुलिस समाज की रक्षा के लिए ही होते है जिसे जनता ने देश के अन्दर तैनात किया है ठीक उसी प्रकार जैसे जनता ने सरहद पर अपनी और देश की हिफ़ाज़त के लिए सेना को नियुक्त किया है। अब जनता को उस दिन की प्रतीक्षा है जब सेना की तरह पुलिस भी ज़िम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह करेगी और पुलिस का डर आम लोगो की जगह अपराधियों के हीे मन में रहेगा वरना जनता के पास वीरू की तरह टंकी पर चढ़ने या ठाकुर की तरह बदला लेने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा जिस पर कम से कम विचार तो होना ही चाहिए।
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