लाइफ़ में कुछ ऐसी ज़रूरी चीज़े होती हैं जिनके कारण दूसरी महत्वपूर्ण चीज़ों के महत्व के बारे मे पता चलता है जैसे सुख का सही मज़ा वही व्यक्ति ले सकता है जिसने दुख का ज़ायक़ा भी चखा हो क्योंकि सुख के बिना दुख और दुख के बिना सुख दोनो ही अर्थहीन हैं। इसी प्रकार सिनेमा और साहित्य में 'मैं' उस कड़ी का नाम हूँ जिसके बिन नायक की कल्पना करना दूध में नीबू निचोड़ने के बराबर है। कोई और नहीं बल्कि खलनायक हूँ 'मैं'।
सिनेमा और साहित्य ही क्यों मैं तो सभी की रियल लाइफ़ में भी होता हूँ क्योंकि लोग चाहे मुझसे कितनी भी नफ़रत करें मैं उनकी लाइफ़ में होता ही हूँ। मैं यानि खलनायक ही स्टोरी को आगे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हूँ और मेरे ही दम पर स्टोरी ज़िन्दा रहती है, मेरे अभाव में स्टोरी की हालत बिन जल की मछली की तरह हो जाती है ये कहना ग़लत नहीं होगा कि मेरे ही कारण स्टोरी का जन्म होता है एवं मेरी मौत के साथ स्टोरी की भी मौत हो जाती है।स्टोरी के जीवन और मौत का यह सबसे प्रमुख सिद्धान्त साहित्य और सिनेमा दोनों में बराबर लागू होता है।
इस सिद्धान्त का एक अच्छा उदाहरण हैरी पाॅटर सीरीज़ के पहले उपन्यास का पहला भाग और फ़िल्म का प्रथम दृश्य है जिसमें एक बच्चे को तीन लोग उसकी आंटी के घर छोड़ने आते हैं क्योंकि वह बच्चा वोल्डेमार्ट के हाथों मरते-मरते बचा होता है। वोल्डेमार्ट कोई और नहीं बल्कि मैं ही होता हूँ जिससे हैरी को महफ़ूज़ रखा जाने का पूरा प्रयास होता है और मेरे ही कारण हैरी से मोहब्बत करने वाले उसके लिए अपनी ज़िन्दगी क़ुर्बान करते जाते हैं लेकिन फ़िल्म और उपन्यास की कहानी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता बल्कि दिलचस्पी में और ज़्यादा बढोत्तरी होती है कि अब हैरी का सामना मुझसे होगा। स्टोरी का 'द एन्ड' भी तब होता है जब हैरी मुझे खत्म कर देता है। स्टोरी का जन्म मेरे साथ होता है और मेरी मौत के साथ स्टोरी की मौत हो जाती है।
मेरा हाल फ़िल्म 'जानी दुश्मन' की रूह जैसा है जो शरीर बदलती रहती है इसी प्रकार मैं भी कभी सुख्खी लाला तो कभी गब्बर सिंह, कभी मोगैम्बो या शाकाल, डा.डैंग, कात्या, जगीरा, डांग, कैप्टन रसल, ग़ज़नी और कभी रामाधीर सिंह या जयकान्त शिकरे आदि का रूप लेकर सामने आता रहता हूँ और भविष्य में भी इसी प्रकार के रूप लेकर आता रहूंगा।
बढ़िया लेख.. कोई नायक तभी है जब कोई खलनायक हो..
ReplyDeleteBahut Badhai Faiz Aapki Lekhni ko salam
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