ऐसा सोचा और माना जाता है कि फ़ीचर फ़िल्में ही समाज से संवाद करती हैं लेकिन शार्ट फिल्म्स भी कहीं पर से फ़ीचर फ़िल्मों से कम नहीं है क्योंकि जो बात फ़ीचर फ़िल्मे घण्टों में करती हैं वही बात शार्ट फ़िल्म्स मिनटों में कर लेती हैं। इसी बात का ज़बरदस्त उदाहरण 'द मिस्ड क्लास, ट्यूब लाइट का चाँद, द क्रश, सत्यजीत राॅय की 'टू' और मार्टिन स्काॅरसेस की 'द बिग शेव' जैसी फ़िल्मे है। यह ज़िन्दगी की कहानी को बहुत ही कम समय मे उस तरह पेश करती है जैसी ज़िन्दगी होती है। शार्ट फ़िल्म्स की इसी श्रेणी में संजीव त्रिगुणायत की 'रेड इंक द ट्रुथ' भी एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण नाम है जो एक ऐसी घटना पर बनी है जिस घटना के बारे मे लोग सोचने से भी डर जाते हैं।
रेड इंक एक लड़की रोशनी की कहानी है जिसके भाई का अपहरण हो जाता है और उसके लिए उसे एक पुलिस काॅन्सटेबिल एक मंत्री के पास ले जाता है जहाँ पर वो उस मंत्री की हवस का शिकार होती है और जब वह इसकी कम्पलेन्ट करना चाहती है तो उसकी शिकायत दर्ज नही होती, न मेडिकल होता है और न ही अख़बार वाले उसकी बात मानते है। जब कहीं पर भी उसकी बात नही सुनी जाती तो विशाल जो एक स्वतंत्र पत्रकार है वह उसकी बात सोशल मीडिया के माध्यम से समाज के समाने रखता है और इस मदद के लिए विशाल को ज़िन्दा जलवा दिया जाता है। बाद में रोशनी विशाल पर ही इल्ज़ाम लगा देती है इसके साथ एक और वीडियो सामने आता है और मंत्री की हँसी के साथ फ़िल्म ख़त्म हो जाती है। कहने को तो यह बहुत आम सी बात है लेकिन संजीव त्रिगुणायत की फ़िल्म की कहानी और दृश्य बहुत ख़ूबसूरती और कलात्मकता के साथ समाज से यह पूछते है कि जब लड़की के भाई का अपहरण हुआ तो लड़की पुलिस स्टेशन क्यों नही गई? बल्कि एक कान्सटेबिल ही उसे मंत्री के पास ले जाता है यहाँ पर यह बात साफ हो रही है कि कान्सटेबिल को खुद यक़ीन है कि पुलिस कुछ काम नही कर सकती और यह बात साबित तब होती है जब लड़की पुलिस स्टेशन जाती है और उसकी शिकायत दर्ज नहीं की जाती।
कहानी के साथ फ़िल्म के संवाद भी बहुत जीवंत है जैसे "तुम्हारे ऐसे पत्रकार हमारे तलवे चाटते हैं हमसे विज्ञापन की भीख मांगते हैं", "मै उन पत्रकारों मे से नहीं हूँ जो आपके तलवे चाटते हैं" यह संवाद समाज को बता रहा है कि मीडिया जो कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है उसकी क्या औक़ात है? साथ में बिकने से वह पत्रकार मना कर रहा है जिसे मुख्य मीडिया के पत्रकार पत्रकार ही नही मानते क्योंकि वह किसी न्यूज़ चैनल या अख़बार का नहीं बल्कि सोशल मीडिया का पत्रकार है। यहाँ पर फ़िल्म निर्देशक ने कला के साथ कई बातों को बताया है जैसे कि सोशल मीडिया जिसे बहुत से लोग अथेन्टिक भी नहीं मानते उसका महत्व कितना ज़्यादा है और अन्तिम वीडियो भी सोशल मीडिया पर ही अपलोड होता है जो विशाल की सच्चाई सामने लाने का प्रयास करता है और समाज किन लोगो को अपना नेता चुनता है और पत्रकारो, डाक्टर्स और पुलिस आदि को नेता कैसे खरीद लेते हैं और जो नही बिकते उनका हाल क्या होता है? यह हमारी सो काल्ड सभ्य सोसायटी के ऊपर बहुत बड़ा सवाल है जिसके बारे मे संजीव त्रिगुणायत सोचने पर विवश कर रहे हैं और हमे इन जैसे सभी विषयों के बारे ज़रूर सोचना और कुछ करना चाहिए।
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