महेश भट्ट ने एक बार यह कहा था कि "कोई भी रचना ओरिजनल नहीं होती बल्कि वह कहीं न कहीं से इन्सपायर ज़रूर होती है यदि रचनाकार में कुछ विशेष होता है तो वह रचना का ट्रीटमेंट होता है या पेश करने का तरीक़ा और कुछ नही" महेश भट्ट की इस बात के बहुत गहरे मायने है क्योंकि इस हक़ीक़त से कोई भी परहेज़ नहीं कर सकता कि रचनाएं कहीं न कहीं से प्रभावित तो होती ही है क्योंकि बिना इन्सपायर हुए तो कोई रचना रचित हो ही नही सकती और जो कर दे उसे महा-महारथी कहे तो फिर ग़लत न होगा।
ऐसी ही इन्सपायर रचनाओं की श्रेणी में एक नाम 'रितेश बत्रा' की 'द लंच बाॅक्स' का नाम भी लिया जा सकता है जो साल 2013 में रिलीज़ हुई थी। द लंच बाक्स डायेरेक्शन, स्क्रीनप्ले-संवाद और अभिनय आदि दृष्टी से यक़ीनन एक बहुत ही शानदार फ़िल्म है किन्तु दर्शको को कोई चीज़ सबसे ज़्यादा बांधे रखती है तो वह फ़िल्म की कहानी होती है। इस फ़िल्म की कहानी मुम्बई मे रह रही 'एक गृहणी की है जो अपने पति का प्यार चाहती है लेकिन वह प्यार उसकी जगह किसी और को मिल रहा होता है। जिससे वह बाद मे परिचित होती है हलाॅकि उससे पहले वह अपने फ़्लैट के ऊपर वाली अंटी से पति का प्यार हासिल करने का तरीक़ा पूछती है। अंटी उसे सलह देती है कि पति के प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है और इसी वजह से वह स्वादिष्ट खाना भेजकर सुकून लेती है कि शायद अब उसे पति का प्यार और वक़्त मिलेगा किन्तु मुम्बई के डिब्बे वाले जो कभी ग़लत जगह डिब्बा नहीं पहुचाते उनसे यहाँ पर ग़लती होती है और डिब्बा ग़लत पते पर पहुच जाता है। पति की बातचीत से वह समझ भी जाती है कि डिब्बा ग़लत जगह जा रहा है फिर वह ख़ाली डिब्बे में लेटर भेजती है। लेटर का जवाब आता है और दोनो के बीच लेटर राईटिंग शुरू हो जाती है हलाॅकि दोनो एक दूसरे से अपरिचित होते है फिर भी लेटर राईटिंग की मेहरबानी से दोनो में आकर्षण बढ़ने लगता है। वह दोनो मिलने के बारे में प्लान बनाते है और दोनो मिलने पहुचते भी है लेकिन आदमी नही मिलता क्योंकि उसे गृहिणी के सामने बूढ़ा होने का एहसास हो जाता है।
यही बात फ़िल्म को सबसे ज़्यादा इन्ट्रेस्टिंग बना देती है कि मीडिया के इस आधुनिक दौर में लेटर राईटिंग के ज़रिए एक युवा गृहीणी और बूढ़े कर्मचारी के बीच प्यार पनपने लगता है। फ़िल्म का यही मनोरंजक पुट इंगलिश लिटरेचर की प्रसिद्ध कहानी 'पेन पाॅल' की याद दिलाता है। पेन पाॅल एक भारतीय युवक होता है जो अग्रेज़ महिला के साथ बीस वर्षो तक लेटर राईटिंग करता है किन्तु वह महिला पेन पाॅल को इस दौरान अपनी कोई भी तस्वीर नहीं भेजती और अन्त में जब उस महिला की तस्वीर एक दूसरी महिला भेजने के साथ उसे यह बताती है कि कार दुर्घटना में महिला की मौत हो गयी है। तस्वीर देखने के बाद ही पेन पाॅल का हार्ड ब्रेक हो जाता है क्योंकि इतने वर्षो से जिसे वह युवती समझ रहा होता है दरासल वह एक वृद्ध महिला होती है और इस डर से अपनी फ़ोटो नहीं भेजती कि कही उसकी लेटर राईटिंग खत्म न हो जाए। यही डर फ़िल्म मे इरफ़ान ख़ान को भी लगता है जब वह होटल में मिलने का वादा कर के भी, नहीं मिलता। यही पर द लंचबाॅक्स अंग्रेज़ी साहित्य की कहानी पेन पाॅल की याद दिला देती है। हिन्दी सिनेमा मे बहुत कम निर्देशक ही साहित्य से प्रभावित होकर फ़िल्म का निर्माण करते है लेकिन रितेश बत्रा की यहाँ पर तारीफ़ तो बनती है कि उन्होंने साहित्य से इन्सपायर होकर 'द लंचबाॅक्स' जैसी ज़बरदस्त फ़ि्ल्म हिन्दी सिनेमा को दी।
Tuesday, February 5, 2019
"पेन पाॅल" की याद दिलाती "द लंचबाॅक्स"
Monday, February 4, 2019
उंगलियो का सफ़र
उर्दू शायरी के बेहतरीन शायरों मे से एक डा.राहत इन्दौरी अक्सर ये बात कहते है कि एक अच्छा शेअर कहने मे कभी-कभी दस महीने या उससे भी ज़्यादा वक़्त लग जाता है क्योंकि कोई भी अच्छा और गहरा शेअर इतनी आसानी से ज़हन मे नहीं आ पाता। अच्छे शेअर की यही ख़ासियत है कि वह दिलों मे बस जाए और जो मज़ा पूरी किताब पढ़ कर आए वह मज़ा अकेले एक शेअर ही दे दे जैसे उर्दू शायरी के महानतम शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को मोमिन खाँ मोमिन का यह शेअर
तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता
इतना पसन्द आया कि ग़ालिब अपना पूरा दीवान इस शेअर के बदले दिये दे रहे थे। जब कभी इसी तरह के बेहतरीन शेअरों की सूची बनेगी तो उस लिस्ट में "शमीम शाहजहाँपुरी" के इस शेअर का एक अलग ही मुक़ाम होगा क्योंकि यह शेअर जब "सज्जाद ज़हीर" के सामने पहुचा था तो सज्जाद ज़हीर ने अपनी ख़ास डायरी में इस शेअर को दर्ज कर लिया। शमीम शाहजहाँपुरी के इस शेअर
" मै कि अल्फ़ाज़ की वादियों का ख़ुदा क़र्नहाक़र्न शोअलों में जलता रहा,
पत्थरों, काग़ज़ों, पेड़ की छाल पर ख़ून रोती रही हैं मेरी उंगलियाँ "
ने उंगलियों के सफ़र को बहुत ख़ूबसूरती के साथ बयान करता है कि कैसे उंगलियों ने एक कभी न ख़्त्म होने वाली यात्रा तय करके विश्व के बेशुमार ज्ञान को हम तक पहुचाने का काम किया है। इन उंगलियों के ही दम से हमने साहित्य को समझा और जाना है।
जिन उंगलियों ने इस ज्ञान के ख़ज़ाने को समाज तक पहुचाया क्या उन उंगलियो को इस समाज से कुछ मिला? इसी बात की तरफ़ शमीम शाहजहाँपुरी अपने इस शेअर के ज़रिए इशारा कर रहे है कि यह ज्ञान का सफ़र जो गुफ़ाओ से शुरु होकर आज इंटरनेट तक पहुच गया है जो हर विषय को समाज तक पहुचाने का काम कर रहा है और समाज ने हर क्षेत्र मे बहुत ज़्यादा उन्नती कर ली है क्या उन उंगलियों ने भी वही उन्नती की है? जीते जी क्या क़लम के जादूगरो को वह इज़्ज़त मिली जिसके वह सभी, सही मायने मे हक़दार थे? इस बात का ज़बरदस्त उदाहरण गुरु दत्त की फ़िल्म प्यासा का वह दृश्य है जिसमे समाज को लगता है कि शायर मर चुका है और मरने के बाद समाज उसे कितना अधिक महान बना देता है जबकि वह शायर ज़िन्दा होता है और उसके जीते जी उसके भाई भी उसे पहचानने से साफ़ इंकार कर देते है। उसके मरने के बाद उससे ऐसा रिश्ता और मोहब्बत का बखान किया जाता है जैसे उन्हें सबसे ज़्यादा मोहब्बत उसी से हो और इस दिखावे का एक और उदाहरण फ़िल्म बाग़बान है कि जब तक पिता के पास पैसे नहीं होते है तब तक उनकी इज़्ज़त नहीं होती बल्कि उन्हें एक बोझ समझा जाता है और जैसे ही पैसे आते है वैसे ही दुनिया भर की मोहब्बत का दिखावा और दोहरा एख़लाक शुरु हो जाता है। शमीम शाहजहाँपुरी का यह शेअर समाज के इस व्यवहार को बता रहा है कि किस प्रकार समाज दोहरा रवैइया और दिखावा करने में महारथ रखता है।
यह शेअर बता रहा है कि इन उंगलियों ने समाज को बहुत कुछ दिया लेकिन समाज ने उंगलियों को कुछ नहीं दिया और यह हाल सभी का है कि आप किसी के लिए कुछ भी कर दो हर आदमी डंक मारने के लिए तैयार बैठा है।
Sunday, April 29, 2018
Sunday, April 22, 2018
Tuesday, April 17, 2018
Monday, April 16, 2018
Wednesday, April 12, 2017
Sunday, March 5, 2017
दिखावा और सुन्दरता
दर्शन शास्त्र जिसे अंग्रेज़ी में फ़िलाॅस्फ़ी कहा जाता है। यह एक ऐसा विषय है जो तजुर्बो पर आधारित होता है। बड़े-बड़े विचारकों ने जो भी अनुभव किया उसे अपने-अपने हिसाब से समाज को अर्पित कर दिया। फ़िलाॅस्फ़ी मात्र एक विषय नहीं बल्कि यह बहुत से विषयों का एक बहुत बड़ा जाल है। ऐसे ही तमाम विषयों में से एक प्रमुख विषय का नाम साहित्य है। साहित्यकार साहित्य के माध्यम से ही जीवन के तजुर्बो को गद्य और पद्य के ज़रिए समाज के सामने पेश करने के महत्वपूर्ण काम को बहुत सुन्दरता के साथ अंजाम देते है एंव समाज को समाज से परिचित करवाते है। ऐसे ही एक फ़लसफ़ी शायर का नाम 'जाॅन एलिया' है जिनकी शायरी की सबस उम्दा अदा यह है कि उनके कहे अशार सुन्ने और पढ़ने में तो बहुत आसान से लगते है लेकिन जब व्यक्ति अशार की गहराई में जाता है तो उसकी हक़ीक़त मन को हिलाकर रखने के साथ विवश करती है यह सोचने पर कि क्या ऐसा भी हो सकता है। जाॅन के द्वारा रचित ऐसी ही रचनात्मक चार पंक्तियों के सौन्दर्यबोध पर बात की जाएगी।
"जो रानाई निगाहों के लिए सामान-ऐ-जलवा है।
लिबास-ऐ-मुफ़्लिसी में कितनी बेक़ीमत नज़र आती॥
यदि बात जाॅन की कही पहली दो पंक्तियों पर की जाए तो यह समाज से यह कह रही है कि जो दिख रहा है वह वास्तविक नहीं है और जो वास्तविक है वह दिख नहीं रहा क्योंकि आज के समाज को तो जैसे दिखावे की आदत सी पड़ गई है। यह कहना कहीं पर से भी ग़लत न होगा कि मनुष्य को वही चीज़े प्रभावित करती जो उसे प्रिय होती है। जैसे अच्छा व्यक्ति ईमानदारी और सत्य से प्रभावित होगा तो वही लोभी व्यक्ति चमक-धमक से क्योंकि दिखावे को हर व्यक्ति का स्वाद पता होता है। दिखावा अपने इसी ज्ञान का फ़ायदा उठाता है और किसी न किसी भेस में आकर सदैव मनुष्य को ठगने के लिए बेताब रहता है। इसी दिखावे का एक बेहतरीन उदाहरण शक्तिमान सीरियल का पात्र 'कुमार रंजन' और फ़िल्म 'कुरुक्षेत्र' का निगेटिव पात्र 'शम्भा जी' है जो सत्य और ईमानदारी का मुखौटा ओढ़कर आते है और अपने मक़सद को अंजाम देते है क्योंकि एसीपी. पृथ्वीराज सिंह जैसे लोग लालच मे नही आने वाले होते है। इसके अतिरिक्त कुमार रंजन जिसका दूसरा रूप साहब का होता है और साहब के ही रूप में वह लालच दिखाकर बुरे लोगो को अपने साथ मिलाता है क्योंकि उसे पता होता है कि कैसे लोग किस तरह और कौन से रूप से प्रभावित होते है। ऐसे लोगो का सिर्फ़ एक ही लक्ष्य होता है कि हर हाल में उनका स्वार्थ पूरा हो चाहे इसके लिए उन्हें कोई सा भी भेस लेना पड़े और कुछ भी करना पड़े। हक़ीक़त में ऐसे लोगो का तो कोई व्यक्तित्व होता ही नहीं है। भले ही वह अपने आप में कितने ही महान, चालाक आदि क्यों न बने और इन जैसी प्रवत्ती के लोग उस झूठ के समान होते है जो सोसायटी के सामने हमेशा सच के लिबास मे आते है और अपनी प्रेजेन्टेशन को ऐसे पेश करता है जैसे वही अन्तिम सत्य है। जाॅन की ख़ासियत यहाँ पर यह रही कि उन्होंने मात्र दो पंक्तियों में कितनी आसानी से ऐसे दिखावे के विषय में बहुत ही रचनात्मक तरीक़े से बता दिया दिया कि रानाई यानी रंगीनियाँ कैसी होती है और जब वह अपने असली रूप में सामने आती है तो कैसी लगती है दोनो में फ़र्क़ हो जाता है।
यहाँ तो जाज़ेबियत भी है दौलत ही की परवर्दा।
ये लड़की फ़ाक़ाकष होती तो बदसूरत नज़र आती॥
इसी रचनात्मकता के साथ जाॅन ने दूसरी पंक्ति भी कही जो सुन्दरता के वास्तविक रूप को बता रही है कि जिसे लोग सुन्दर समझ रहे है वह तो वास्तव में सुन्दर है ही नहीं और जो हक़ीक़त में सुन्दर है उसकी तो कहीं चर्चा ही नही है। जिसका एक बेहतरीन उदाहरण सिंगरैला की कहानी है क्योंकि जो सुन्दर दिख रहे है उन्होंने कभी भूखे रहने का स्वाद नहीं चखा, कभी ग़रीबी नहीं देखी और इसी वजह से ही उनकी सुन्दरता उनकी परेशानियों में छिप गयी है इसलिए लोग उनकी सुन्दरता को नहीं देख पा रहे है और जिसकी सुन्दरता को वह देख रहे है वह दौलत के लिबास की सुन्दरता है न कि उनकी अपनी। इसी वजह से ही लोग धोखा खा जाते है जिसके विषय में जाॅन बहुत ही सरल शब्दों मे बता रहे है कि नज़र ऐसी हो जो वास्तविकता को देखने की क्षमता रखती हो न कि दिखावे को देखकर उस पर फ़िदा हो जाए।
Saturday, March 4, 2017
शोले का क़ीमती सवाल
हिन्दी सिनेमा के इतिहास की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों पर जब कभी भी बात की जाएगी तो तमाम फ़िल्मों के साथ सन् 1975 में आई 'रमेश सिप्पी की शोले' का नाम ज़रूर आएगा क्योंकि शोले के अभाव में तो हिन्दी सिनेमा के इतिहास पर बात हो ही नहीं सकती। इस फ़िल्म में मनोरंजन के ऐसे शानदार आयाम है कि आज भी लोग इसे बहुत ही चाॅव के साथ देखते है फिर चाहे वह बंसती रूपी, सुरमा भोपाली रूपी, जेलर रूपी या फिर वीरू रूपी चंचलता हो या राधा, रामलाल या फिर जय जैसी गंभीरता हो और प्रतिशोध की आग चाहे गब्बर जैसी हो या ठाकुर ऐसी आदि पात्र शोले को हिन्दी सिनेमा मे एक महान् कृति बना देते है। बात यदि शोले की कहानी पर की जाए तो इसकी बहुत ही साधारण है यह एक रेवेन्ज स्टोरी है जिसमे एक पूर्व पुलिस इंसपेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह एक ख़तरनाक डाकू गब्बर सिंह को ज़िन्दा पकड़वाकर उससे बदला लेना चाहता है। अपने मक़सद को पूरा करने के लिए वह जय-वीरू नाम के दो चोर-बदमाशों का इस्तेमाल करता है क्योंकि एक बार ठाकुर ट्रेन में उनकी वीरता और उनके अन्दर छुपी हुई इन्सानियत को देख चुका था। कहानी इतनी ही है और चूंकि शोले एक फ़ीचर फ़िल्म है जिसका काम दर्शको का मनोरंजन करना है तो उसमे कुछ अन्य चीज़े भी शामिल की गयी जैसे जय, अनवर की मौत , वीरू के ड्रामें,गाने आदि लेकिन इस मनोरंजक फ़िल्म ने सोसायटी के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल छोड़ा। सवाल यह है कि ठाकुर बलदेव सिंह जो कि अपने दौर में एक बहादुर, ईमानदाए पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर रह चुका है उसने अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए जय और वीरू को ही इस क़ाबिल क्यों समझा? जबकि ठाकुर साहब यह बात बहुत अच्छी तरह से जानते है कि वह दोनों चोर-बदमाश है और पुलिस एंव बदमाशो का हाल कृष्ण और कंस जैसा है फिर भी ठाकुर साहब ने जय-वीरू को चुना। पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह का यह फ़ैसला इस बात का पक्का सबूत है कि ठाकुर को यह बहुत अच्छी तरह से पता है कि पुलिस उनके किसी काम नहीं आ सकती। एक और नज़रिये से देखा जाए तो शोलेे ने सम्पूर्ण पुलिस व्यवस्था को ही कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है कि जो पुलिस अपने ही एक आदमी की सहायता नहीं कर सकती वह दूसरों की मदद कैसे करेगी? यदि पुलिस अपनी ज़िम्मेदारियों का सही से निर्वाह करती तो क्या ठाकुर जय-वीरू का इस्तेमाल करते! इससे हटकर बात यदि आज के दौर की पुलिस व्यवस्था पर की जाए तो कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है और इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्दालय के उस छात्र का न मिलना है जिसे पुलिस तीन महीनों से भी अधिक वक़्त से ढूंढ रही है। इसके विपरीत एक और ताज्जुबख़ेज़ घटना सामने आती है कि देश की एक प्रतिष्ठित जेल से अपराधी फ़रार होते है और पुलिस कुछ ही घंटो में उन्हें ढूंढकर उनका एनकाउंटर भी कर देती है पता नहीं यहाँ पर पुलिस कैसे इतना अच्छा प्रदर्शन कर देती है और दूसरी जगह उसे तीन महीनों की मेहनत के बाद भी सफ़लता नहीं मिल रही है। अब जब ऐसी घटनाए सोसायटी सामने आएंगी तो पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठना तो वाजिब हो ही जाएगा। बसंती के शब्दो में समझने वाली बात यह है कि शोले ने 1975ईसवी में ही पुलिस की हालत को समाज के सामने रख दिया था कि जब उस वक़्त पुलिस ऐसी थी तो आज अगर उसकी कार्यशैली पर सवाल उठ रहें है तो कौन सी बड़ी बात है क्योंकि दिखता तो यही है कि पुलिस सिर्फ़ कमज़ोर लोगो से बहुत चढ़ कर बात करती है और कोई उससे इक्किस पड़ गया तो पीछे गाली और सामने सर-सर के अलावा कुछ नहीं करती। इसके साथ सत्ता पक्ष पर तो बहुत अधिक महरबान रहती है। यही प्रमुख वजह है जिससे आज भी लोगो की नज़रो में पुलिस की वह अाहमियत नहीं है जो हक़ीक़त में होनी चाहिए क्योंकि क़ानूनन एंव पुलिस समाज की रक्षा के लिए ही होते है जिसे जनता ने देश के अन्दर तैनात किया है ठीक उसी प्रकार जैसे जनता ने सरहद पर अपनी और देश की हिफ़ाज़त के लिए सेना को नियुक्त किया है। अब जनता को उस दिन की प्रतीक्षा है जब सेना की तरह पुलिस भी ज़िम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह करेगी और पुलिस का डर आम लोगो की जगह अपराधियों के हीे मन में रहेगा वरना जनता के पास वीरू की तरह टंकी पर चढ़ने या ठाकुर की तरह बदला लेने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा जिस पर कम से कम विचार तो होना ही चाहिए।
Tuesday, May 24, 2016
नायक माने हीरो और आइकन
अक्सर ऐसा माना जाता है कि बच्चों को अच्छे और बुरे का ज्ञान नहीं होता लेकिन फिर भी बचपन में बच्चे क्रिश, शक्तिमान, हातिम, कैप्टन अमेरिका, आयरन मैन, सुपरमैन, कर्मा, मोटू-पतलू, जूनियर-जी, मिस्टर इण्डिया और हैरी पाॅटर जैसे चरित्रों को पसन्द करते हैं न कि काल, वोल्डोमार्ट, डा.जयकाल, तमराज किलविष, अल्ट्राॅन, लोकी और मोगैम्बो जैसे कैरेक्टर्स को क्योंकि बचपन से ही हमारी लाइफ़ में कुछ ऐसे ख़ास बिम्बों का निर्माण होता है जो हमे अच्छे और बुरे के बीच की खाई के फ़र्क़ को समझाने में मदद करते हैं। इन्ही बिम्बों के कारण बच्चे शक्तिमान को अपना हीरो मानते हैं न कि तमराज किलविष को। फिर भी न जाने क्यों माता-पिता यही मानते हैं कि बच्चों को सही-ग़लत की समझ नहीं होती क्योंकि टेलीविज़न पर तो वह अपना आईकन हैरी पाॅटर को मानते है लेकिन रियल लाइफ़ में बच्चों का आइकन मोहल्ले का वह लड़का होता है जो आम भाषा में उस एरिये का डाॅन कहलाता है। यही मुख्य कारण मां-बाप को यह समझने पर मजबूर कर देता है कि बच्चों को सही-ग़लत का अन्तर नही मालूम है क्योंकि इस समय उनके सपने होते है कि उनका बच्चा डाॅन को नहीं बल्कि 'कलाम साहब' और उनके ऐसे व्यक्तित्व के लोगो को अपना हीरो माने और बड़ा होकर अच्छे गुणों से उनका नाम रोशन करे।
जैसे-जैसे वह बालक अपनी उम्र के पड़ावों को तय करता जाता है ठीक वैसे-वैसे उसके आइकन में बदलाव आने शुरु हो जाते हैं क्योंकि उम्र के पड़ाव उसकी समझ का विकास करते हैं। फिर जब वह उससे भी मज़बूत व्यक्ति से मिलता है खासतौर से परिवार से अलग वह शक़्स जो बालक को प्यार के साथ रुपये भी देता है तो कुछ समय के लिए बच्चा उस पर फ़िदा हो जाता है। इसी प्रकार उसकी पसन्द बदलती रहती है या कहना अनुचित न होगा कि उसके आइकन बदलते रहते हैं और जब वह आइकन के सिद्धान्त को समझ जाता है तो वह दूसरो में भी इसकी समझ विकसित करने की कोशिश करता है।
इस पूरी प्रक्रिया में सारा खेल 'आइकन' के ही इर्द-गिर्द चलता है लेकिन शायद ही किसी का ध्यान इस ओर गया हो कि यह आइकन है क्या? इसी आइकन को आम भाषा में हीरो कहा जाता है।इस हीरो को सिनेमा और साहित्य में 'नायक' की संज्ञा दी गई है।नायक उस कड़ी का नाम है जिसके आस-पास कहानी मंडराती है एवं उसके पास ढेर सारी मोहब्बत, हमदर्दी और भावनाओं का ख़ज़ाना होता है जिसका उदाहरण है प्रेमचन्द की 'ईदगाह' और 'पूस की रात' फिल्म शोले और मुग़ले-ए-आज़म जिसमे हामिद, हल्कू, जय-वीरू, ठाकुर, सलीम और अनारकली के साथ इन चीज़ो का अम्बार लग जाता है और यहाँ तक कि जो लोग ज़्यादा इमोश्नल होते है वह नायक का दर्द महसूस कर रोने भी लगते हैं। इसी वजह से बच्चों के साथ सभी को हीरो यानी नायक ही पसन्द आता है क्योंकि नायक रोशनी, अच्छाई और सच्चाई का प्रतीक होता है और यही प्रतीक हमारी समझ का दायरा विकसित करने की बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी है क्योंकि इस प्रतीक की मेहरबानी से ही हम सही और ग़लत नाम की दो मंजिलों में से एक को अपनी मंजिल बनाते हैं। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम नायक से प्रभावित होते हैं या खलनायक से और कौन सी मंज़िल की ओर चलते हैं?
Saturday, May 21, 2016
रेड इंक के सवाल
ऐसा सोचा और माना जाता है कि फ़ीचर फ़िल्में ही समाज से संवाद करती हैं लेकिन शार्ट फिल्म्स भी कहीं पर से फ़ीचर फ़िल्मों से कम नहीं है क्योंकि जो बात फ़ीचर फ़िल्मे घण्टों में करती हैं वही बात शार्ट फ़िल्म्स मिनटों में कर लेती हैं। इसी बात का ज़बरदस्त उदाहरण 'द मिस्ड क्लास, ट्यूब लाइट का चाँद, द क्रश, सत्यजीत राॅय की 'टू' और मार्टिन स्काॅरसेस की 'द बिग शेव' जैसी फ़िल्मे है। यह ज़िन्दगी की कहानी को बहुत ही कम समय मे उस तरह पेश करती है जैसी ज़िन्दगी होती है। शार्ट फ़िल्म्स की इसी श्रेणी में संजीव त्रिगुणायत की 'रेड इंक द ट्रुथ' भी एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण नाम है जो एक ऐसी घटना पर बनी है जिस घटना के बारे मे लोग सोचने से भी डर जाते हैं।
रेड इंक एक लड़की रोशनी की कहानी है जिसके भाई का अपहरण हो जाता है और उसके लिए उसे एक पुलिस काॅन्सटेबिल एक मंत्री के पास ले जाता है जहाँ पर वो उस मंत्री की हवस का शिकार होती है और जब वह इसकी कम्पलेन्ट करना चाहती है तो उसकी शिकायत दर्ज नही होती, न मेडिकल होता है और न ही अख़बार वाले उसकी बात मानते है। जब कहीं पर भी उसकी बात नही सुनी जाती तो विशाल जो एक स्वतंत्र पत्रकार है वह उसकी बात सोशल मीडिया के माध्यम से समाज के समाने रखता है और इस मदद के लिए विशाल को ज़िन्दा जलवा दिया जाता है। बाद में रोशनी विशाल पर ही इल्ज़ाम लगा देती है इसके साथ एक और वीडियो सामने आता है और मंत्री की हँसी के साथ फ़िल्म ख़त्म हो जाती है। कहने को तो यह बहुत आम सी बात है लेकिन संजीव त्रिगुणायत की फ़िल्म की कहानी और दृश्य बहुत ख़ूबसूरती और कलात्मकता के साथ समाज से यह पूछते है कि जब लड़की के भाई का अपहरण हुआ तो लड़की पुलिस स्टेशन क्यों नही गई? बल्कि एक कान्सटेबिल ही उसे मंत्री के पास ले जाता है यहाँ पर यह बात साफ हो रही है कि कान्सटेबिल को खुद यक़ीन है कि पुलिस कुछ काम नही कर सकती और यह बात साबित तब होती है जब लड़की पुलिस स्टेशन जाती है और उसकी शिकायत दर्ज नहीं की जाती।
कहानी के साथ फ़िल्म के संवाद भी बहुत जीवंत है जैसे "तुम्हारे ऐसे पत्रकार हमारे तलवे चाटते हैं हमसे विज्ञापन की भीख मांगते हैं", "मै उन पत्रकारों मे से नहीं हूँ जो आपके तलवे चाटते हैं" यह संवाद समाज को बता रहा है कि मीडिया जो कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है उसकी क्या औक़ात है? साथ में बिकने से वह पत्रकार मना कर रहा है जिसे मुख्य मीडिया के पत्रकार पत्रकार ही नही मानते क्योंकि वह किसी न्यूज़ चैनल या अख़बार का नहीं बल्कि सोशल मीडिया का पत्रकार है। यहाँ पर फ़िल्म निर्देशक ने कला के साथ कई बातों को बताया है जैसे कि सोशल मीडिया जिसे बहुत से लोग अथेन्टिक भी नहीं मानते उसका महत्व कितना ज़्यादा है और अन्तिम वीडियो भी सोशल मीडिया पर ही अपलोड होता है जो विशाल की सच्चाई सामने लाने का प्रयास करता है और समाज किन लोगो को अपना नेता चुनता है और पत्रकारो, डाक्टर्स और पुलिस आदि को नेता कैसे खरीद लेते हैं और जो नही बिकते उनका हाल क्या होता है? यह हमारी सो काल्ड सभ्य सोसायटी के ऊपर बहुत बड़ा सवाल है जिसके बारे मे संजीव त्रिगुणायत सोचने पर विवश कर रहे हैं और हमे इन जैसे सभी विषयों के बारे ज़रूर सोचना और कुछ करना चाहिए।