Sunday, March 5, 2017

दिखावा और सुन्दरता

दर्शन शास्त्र जिसे अंग्रेज़ी में फ़िलाॅस्फ़ी कहा जाता है। यह एक ऐसा विषय है जो तजुर्बो पर आधारित होता है। बड़े-बड़े विचारकों ने जो भी अनुभव किया उसे अपने-अपने हिसाब से समाज को अर्पित कर दिया। फ़िलाॅस्फ़ी मात्र एक विषय नहीं बल्कि यह बहुत से विषयों का एक बहुत बड़ा जाल है। ऐसे ही तमाम विषयों में से एक प्रमुख विषय का नाम साहित्य है। साहित्यकार साहित्य के माध्यम से ही जीवन के तजुर्बो को गद्य और पद्य के ज़रिए समाज के सामने पेश करने के महत्वपूर्ण काम को बहुत सुन्दरता के साथ अंजाम देते है एंव समाज को समाज से परिचित करवाते है। ऐसे ही एक फ़लसफ़ी शायर का नाम 'जाॅन एलिया' है जिनकी शायरी की सबस उम्दा अदा यह है कि उनके कहे अशार सुन्ने और पढ़ने में तो बहुत आसान से लगते है लेकिन जब व्यक्ति अशार की गहराई में जाता है तो उसकी हक़ीक़त मन को हिलाकर रखने के साथ विवश करती है यह सोचने पर कि क्या ऐसा भी हो सकता है। जाॅन के द्वारा रचित ऐसी ही रचनात्मक चार पंक्तियों के सौन्दर्यबोध पर बात की जाएगी।

"जो रानाई निगाहों के लिए सामान-ऐ-जलवा है।
लिबास-ऐ-मुफ़्लिसी में कितनी बेक़ीमत नज़र आती॥

यदि बात जाॅन की कही पहली दो पंक्तियों पर की जाए तो यह समाज से यह कह रही है कि जो दिख रहा है वह वास्तविक नहीं है और जो वास्तविक है वह दिख नहीं रहा क्योंकि आज के समाज को तो जैसे दिखावे की आदत सी पड़ गई है। यह कहना कहीं पर से भी ग़लत न होगा कि मनुष्य को  वही चीज़े प्रभावित करती जो उसे प्रिय होती है। जैसे अच्छा व्यक्ति ईमानदारी और सत्य से प्रभावित होगा तो वही लोभी व्यक्ति चमक-धमक से क्योंकि दिखावे को हर व्यक्ति का स्वाद पता होता है। दिखावा अपने इसी ज्ञान का फ़ायदा उठाता है और किसी न किसी भेस में आकर सदैव मनुष्य को ठगने के लिए बेताब रहता है। इसी दिखावे का एक बेहतरीन उदाहरण शक्तिमान सीरियल का पात्र 'कुमार रंजन' और फ़िल्म 'कुरुक्षेत्र' का निगेटिव पात्र 'शम्भा जी' है जो सत्य और ईमानदारी का मुखौटा ओढ़कर आते है और अपने मक़सद को अंजाम देते है क्योंकि एसीपी. पृथ्वीराज सिंह जैसे लोग लालच मे नही आने वाले होते है। इसके अतिरिक्त कुमार रंजन जिसका दूसरा रूप साहब का होता है और साहब के ही रूप में वह लालच दिखाकर बुरे लोगो को अपने साथ मिलाता है क्योंकि उसे पता होता है कि कैसे लोग किस तरह और कौन से रूप से प्रभावित होते है। ऐसे लोगो का सिर्फ़ एक ही लक्ष्य होता है कि हर हाल में उनका स्वार्थ पूरा हो चाहे इसके लिए उन्हें कोई सा भी भेस लेना पड़े और कुछ भी करना पड़े। हक़ीक़त में ऐसे लोगो का तो  कोई व्यक्तित्व होता ही नहीं है। भले ही वह अपने आप में कितने ही महान, चालाक आदि क्यों न बने और इन जैसी प्रवत्ती के लोग उस झूठ के समान होते है जो सोसायटी के सामने हमेशा सच के लिबास मे आते है और अपनी प्रेजेन्टेशन को ऐसे पेश करता है जैसे वही अन्तिम सत्य है। जाॅन की ख़ासियत यहाँ पर यह रही कि उन्होंने मात्र दो पंक्तियों में कितनी आसानी से ऐसे दिखावे के विषय में बहुत ही रचनात्मक तरीक़े से बता दिया दिया कि रानाई यानी रंगीनियाँ कैसी होती है और जब वह अपने असली रूप में सामने आती है तो कैसी लगती है दोनो में फ़र्क़ हो जाता है।

यहाँ तो जाज़ेबियत भी है दौलत ही की परवर्दा।
ये लड़की फ़ाक़ाकष होती तो बदसूरत नज़र आती॥

इसी रचनात्मकता के साथ जाॅन ने दूसरी पंक्ति भी कही जो सुन्दरता के वास्तविक रूप को बता रही है कि जिसे लोग सुन्दर समझ रहे है वह तो वास्तव में सुन्दर है ही नहीं और जो हक़ीक़त में सुन्दर है उसकी तो कहीं चर्चा ही नही है। जिसका एक बेहतरीन उदाहरण सिंगरैला की कहानी है क्योंकि जो सुन्दर दिख रहे है उन्होंने कभी भूखे रहने का स्वाद नहीं चखा, कभी ग़रीबी नहीं देखी और इसी वजह से ही उनकी सुन्दरता उनकी परेशानियों में छिप गयी है इसलिए लोग उनकी सुन्दरता को नहीं देख पा रहे है और जिसकी सुन्दरता को वह देख रहे है वह दौलत के लिबास की सुन्दरता है न कि उनकी अपनी। इसी वजह से ही लोग धोखा खा जाते है जिसके विषय में जाॅन बहुत ही सरल शब्दों मे बता रहे है कि नज़र ऐसी हो जो वास्तविकता को देखने की क्षमता रखती हो न कि दिखावे को देखकर उस पर फ़िदा हो जाए।

Saturday, March 4, 2017

शोले का क़ीमती सवाल

हिन्दी सिनेमा के इतिहास की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों पर जब कभी भी बात की जाएगी तो तमाम फ़िल्मों के साथ सन् 1975 में आई 'रमेश सिप्पी की शोले' का नाम ज़रूर आएगा क्योंकि शोले के अभाव में तो हिन्दी सिनेमा के इतिहास पर बात हो ही नहीं सकती। इस फ़िल्म में मनोरंजन के ऐसे शानदार आयाम है कि आज भी लोग इसे बहुत ही चाॅव के साथ देखते है फिर चाहे वह बंसती रूपी, सुरमा भोपाली रूपी, जेलर रूपी या फिर वीरू रूपी चंचलता हो या राधा, रामलाल या फिर जय जैसी गंभीरता हो और प्रतिशोध की आग चाहे गब्बर जैसी हो या ठाकुर ऐसी आदि पात्र शोले को हिन्दी सिनेमा मे एक महान् कृति बना देते है। बात यदि शोले की कहानी पर की जाए तो इसकी बहुत ही साधारण है यह एक रेवेन्ज स्टोरी है जिसमे एक पूर्व पुलिस इंसपेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह एक ख़तरनाक डाकू गब्बर सिंह को ज़िन्दा पकड़वाकर उससे बदला लेना चाहता है। अपने मक़सद को पूरा करने के लिए वह जय-वीरू नाम के दो चोर-बदमाशों का इस्तेमाल करता है क्योंकि एक बार ठाकुर ट्रेन में उनकी वीरता और उनके अन्दर छुपी हुई इन्सानियत को देख चुका था। कहानी इतनी ही है और चूंकि शोले एक फ़ीचर फ़िल्म है जिसका काम दर्शको का मनोरंजन करना है तो उसमे कुछ अन्य चीज़े भी शामिल की गयी जैसे जय, अनवर की मौत , वीरू के ड्रामें,गाने आदि लेकिन इस मनोरंजक फ़िल्म ने सोसायटी के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल छोड़ा। सवाल यह है कि ठाकुर बलदेव सिंह जो कि अपने दौर में एक बहादुर, ईमानदाए पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर रह चुका है उसने अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए जय और वीरू को ही इस क़ाबिल क्यों समझा? जबकि ठाकुर साहब यह बात बहुत अच्छी तरह से जानते है कि वह दोनों चोर-बदमाश है और पुलिस एंव बदमाशो का हाल कृष्ण और कंस जैसा है फिर भी ठाकुर साहब ने जय-वीरू को चुना। पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह का यह फ़ैसला इस बात का पक्का सबूत है कि ठाकुर को यह बहुत अच्छी तरह से पता है कि पुलिस उनके किसी काम नहीं आ सकती। एक और नज़रिये से देखा जाए तो शोलेे ने सम्पूर्ण पुलिस व्यवस्था को ही कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है कि जो पुलिस अपने ही एक आदमी की सहायता नहीं कर सकती वह दूसरों की मदद कैसे करेगी? यदि पुलिस अपनी ज़िम्मेदारियों का सही से निर्वाह करती तो क्या ठाकुर जय-वीरू का इस्तेमाल करते! इससे हटकर बात यदि आज के दौर की पुलिस व्यवस्था पर की जाए तो कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है और इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्दालय के उस छात्र का न मिलना है जिसे पुलिस तीन महीनों से भी अधिक वक़्त से ढूंढ रही है। इसके विपरीत एक और ताज्जुबख़ेज़ घटना सामने आती है कि देश की एक प्रतिष्ठित जेल से अपराधी फ़रार होते है और पुलिस कुछ ही घंटो में उन्हें ढूंढकर उनका एनकाउंटर भी कर देती है पता नहीं यहाँ पर पुलिस कैसे इतना अच्छा प्रदर्शन कर देती है और दूसरी जगह उसे तीन महीनों की मेहनत के बाद भी सफ़लता नहीं मिल रही है। अब जब ऐसी घटनाए सोसायटी सामने आएंगी तो पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठना तो वाजिब हो ही जाएगा। बसंती के शब्दो में समझने वाली बात यह है कि शोले ने 1975ईसवी में ही पुलिस की हालत को समाज के सामने रख दिया था कि जब उस वक़्त पुलिस ऐसी थी तो आज अगर उसकी कार्यशैली पर सवाल उठ रहें है तो कौन सी बड़ी बात है क्योंकि दिखता तो यही है कि पुलिस सिर्फ़ कमज़ोर लोगो से बहुत चढ़ कर बात करती है और कोई उससे इक्किस पड़ गया तो पीछे गाली और सामने सर-सर के अलावा कुछ नहीं करती। इसके साथ सत्ता पक्ष पर तो बहुत अधिक महरबान रहती है। यही प्रमुख वजह है जिससे आज भी लोगो की नज़रो में पुलिस की वह अाहमियत नहीं है जो हक़ीक़त में होनी चाहिए क्योंकि क़ानूनन एंव पुलिस समाज की रक्षा के लिए ही होते है जिसे जनता ने देश के अन्दर तैनात किया है ठीक उसी प्रकार जैसे जनता ने सरहद पर अपनी और देश की हिफ़ाज़त के लिए सेना को नियुक्त किया है। अब जनता को उस दिन की प्रतीक्षा है जब सेना की तरह पुलिस भी ज़िम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह करेगी और पुलिस का डर आम लोगो की जगह अपराधियों के हीे मन में रहेगा वरना जनता के पास वीरू की तरह टंकी पर चढ़ने या ठाकुर की तरह बदला लेने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा जिस पर कम से कम विचार तो होना ही चाहिए।

Tuesday, May 24, 2016

नायक माने हीरो और आइकन

अक्सर ऐसा माना जाता है कि बच्चों को अच्छे और बुरे का ज्ञान नहीं होता लेकिन फिर भी बचपन में बच्चे क्रिश, शक्तिमान, हातिम, कैप्टन अमेरिका, आयरन मैन, सुपरमैन, कर्मा, मोटू-पतलू, जूनियर-जी, मिस्टर इण्डिया और हैरी पाॅटर जैसे चरित्रों को पसन्द करते हैं न कि काल, वोल्डोमार्ट, डा.जयकाल, तमराज किलविष, अल्ट्राॅन, लोकी और मोगैम्बो जैसे कैरेक्टर्स को क्योंकि बचपन से ही हमारी लाइफ़ में कुछ ऐसे ख़ास बिम्बों का निर्माण होता है जो हमे अच्छे और बुरे के बीच की खाई के फ़र्क़ को समझाने में मदद करते हैं। इन्ही बिम्बों के कारण बच्चे शक्तिमान को अपना हीरो मानते हैं न कि तमराज किलविष को। फिर भी न जाने क्यों माता-पिता यही मानते हैं कि बच्चों को सही-ग़लत की समझ नहीं होती क्योंकि टेलीविज़न पर तो वह अपना आईकन हैरी पाॅटर को मानते है लेकिन रियल लाइफ़ में बच्चों का आइकन मोहल्ले का वह लड़का होता है जो आम भाषा में उस एरिये का डाॅन कहलाता है। यही मुख्य कारण मां-बाप को यह समझने पर मजबूर कर देता है कि बच्चों को सही-ग़लत का अन्तर नही मालूम है क्योंकि इस समय उनके सपने होते है कि उनका बच्चा डाॅन को नहीं बल्कि 'कलाम साहब' और उनके ऐसे व्यक्तित्व के लोगो को अपना हीरो माने और बड़ा होकर अच्छे गुणों से उनका नाम रोशन करे।

जैसे-जैसे वह बालक अपनी उम्र के पड़ावों को तय करता जाता है ठीक वैसे-वैसे उसके आइकन में बदलाव आने शुरु हो जाते हैं क्योंकि उम्र के पड़ाव उसकी समझ का विकास करते हैं। फिर जब वह उससे भी मज़बूत व्यक्ति से मिलता है खासतौर से परिवार से अलग वह शक़्स जो बालक को प्यार के साथ रुपये भी देता है तो कुछ समय के लिए बच्चा उस पर फ़िदा हो जाता है। इसी प्रकार उसकी पसन्द बदलती रहती है या कहना अनुचित न होगा कि उसके आइकन बदलते रहते हैं और जब वह आइकन के सिद्धान्त को समझ जाता है तो वह दूसरो में भी इसकी समझ विकसित करने की कोशिश करता है।

इस पूरी प्रक्रिया में सारा खेल 'आइकन' के ही इर्द-गिर्द चलता है लेकिन शायद ही किसी का ध्यान इस ओर गया हो कि  यह आइकन है क्या? इसी आइकन को आम भाषा में हीरो कहा जाता है।इस हीरो को सिनेमा और साहित्य में 'नायक' की संज्ञा दी गई है।नायक उस कड़ी का नाम है जिसके आस-पास कहानी मंडराती है एवं उसके पास ढेर सारी मोहब्बत, हमदर्दी और भावनाओं का ख़ज़ाना होता है जिसका उदाहरण है प्रेमचन्द की 'ईदगाह' और 'पूस की रात' फिल्म शोले और मुग़ले-ए-आज़म जिसमे हामिद, हल्कू, जय-वीरू, ठाकुर, सलीम और अनारकली के साथ इन चीज़ो का अम्बार लग जाता है और यहाँ तक कि जो लोग ज़्यादा इमोश्नल होते है वह नायक का दर्द महसूस कर रोने भी लगते हैं। इसी वजह से बच्चों के साथ सभी को हीरो यानी नायक ही पसन्द आता है क्योंकि नायक रोशनी, अच्छाई और सच्चाई का प्रतीक होता है और यही प्रतीक हमारी समझ का दायरा विकसित करने की बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी है क्योंकि इस प्रतीक की मेहरबानी से ही हम सही और ग़लत नाम की दो मंजिलों में से एक को अपनी मंजिल बनाते हैं। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम नायक से प्रभावित होते हैं या खलनायक से और कौन सी मंज़िल की ओर चलते हैं?

Saturday, May 21, 2016

रेड इंक के सवाल

ऐसा सोचा और माना जाता है कि फ़ीचर फ़िल्में ही समाज से संवाद करती हैं लेकिन शार्ट फिल्म्स भी कहीं पर से फ़ीचर फ़िल्मों से कम नहीं है क्योंकि जो बात फ़ीचर फ़िल्मे घण्टों में करती हैं वही बात शार्ट फ़िल्म्स मिनटों में कर लेती हैं। इसी बात का ज़बरदस्त उदाहरण 'द मिस्ड क्लास, ट्यूब लाइट का चाँद, द क्रश, सत्यजीत राॅय की 'टू' और मार्टिन स्काॅरसेस की 'द बिग शेव' जैसी फ़िल्मे है। यह ज़िन्दगी की कहानी को बहुत ही कम समय मे उस तरह पेश करती है जैसी ज़िन्दगी होती है। शार्ट फ़िल्म्स की इसी श्रेणी में संजीव त्रिगुणायत की 'रेड इंक द ट्रुथ' भी एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण नाम है जो एक ऐसी घटना पर बनी है जिस घटना के बारे मे लोग सोचने से भी डर जाते हैं।

रेड इंक एक लड़की रोशनी की कहानी है जिसके भाई का अपहरण हो जाता है और उसके लिए उसे एक पुलिस काॅन्सटेबिल एक मंत्री के पास ले जाता है जहाँ पर वो उस मंत्री की हवस का शिकार होती है और जब वह इसकी कम्पलेन्ट करना चाहती है तो उसकी शिकायत दर्ज नही होती, न मेडिकल होता है और न ही अख़बार वाले उसकी बात मानते है। जब कहीं पर भी उसकी बात नही सुनी जाती तो विशाल जो एक स्वतंत्र पत्रकार है वह उसकी बात सोशल मीडिया के माध्यम से समाज के समाने रखता है और इस मदद के लिए विशाल को ज़िन्दा जलवा दिया जाता है। बाद में रोशनी विशाल पर ही इल्ज़ाम लगा देती है इसके साथ एक और वीडियो सामने आता है और मंत्री की हँसी के साथ फ़िल्म ख़त्म हो जाती है। कहने को तो यह बहुत आम सी बात है लेकिन संजीव त्रिगुणायत की फ़िल्म की कहानी और दृश्य बहुत ख़ूबसूरती और कलात्मकता के साथ समाज से यह पूछते है कि जब लड़की के भाई का अपहरण हुआ तो लड़की पुलिस स्टेशन क्यों नही गई? बल्कि एक कान्सटेबिल ही उसे मंत्री के पास ले जाता है यहाँ पर यह बात साफ हो रही है कि कान्सटेबिल को खुद यक़ीन है कि पुलिस कुछ काम नही कर सकती और यह बात साबित तब होती है जब लड़की पुलिस स्टेशन जाती है और उसकी शिकायत दर्ज नहीं की जाती।

कहानी के साथ फ़िल्म के संवाद भी बहुत जीवंत है जैसे "तुम्हारे ऐसे पत्रकार हमारे तलवे चाटते हैं हमसे विज्ञापन की भीख मांगते हैं", "मै उन पत्रकारों मे से नहीं हूँ जो आपके तलवे चाटते हैं" यह संवाद समाज को बता रहा है कि मीडिया जो कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है उसकी क्या औक़ात है? साथ में बिकने से वह पत्रकार मना कर रहा है जिसे मुख्य मीडिया के पत्रकार पत्रकार ही नही मानते क्योंकि वह किसी न्यूज़ चैनल या अख़बार का नहीं बल्कि सोशल मीडिया का पत्रकार है। यहाँ पर फ़िल्म निर्देशक ने कला के साथ कई बातों को बताया है  जैसे कि सोशल मीडिया जिसे बहुत से लोग अथेन्टिक भी नहीं मानते उसका महत्व कितना ज़्यादा है और अन्तिम वीडियो भी सोशल मीडिया पर ही अपलोड होता है जो विशाल की सच्चाई सामने लाने का प्रयास करता है और समाज किन लोगो को अपना नेता चुनता है और पत्रकारो, डाक्टर्स और पुलिस आदि को नेता कैसे खरीद लेते हैं और जो नही बिकते उनका हाल क्या होता है? यह हमारी सो काल्ड सभ्य सोसायटी के ऊपर बहुत बड़ा सवाल है जिसके बारे मे संजीव त्रिगुणायत सोचने पर विवश कर रहे हैं और हमे इन जैसे सभी विषयों के बारे ज़रूर सोचना और कुछ करना चाहिए।

Saturday, March 12, 2016

खलनायक हूँ मै


लाइफ़ में कुछ ऐसी ज़रूरी चीज़े होती हैं जिनके कारण दूसरी महत्वपूर्ण चीज़ों के महत्व के बारे मे पता चलता है जैसे सुख का सही मज़ा वही व्यक्ति ले सकता है जिसने दुख का ज़ायक़ा भी चखा हो क्योंकि सुख के बिना दुख और दुख के बिना सुख दोनो ही अर्थहीन हैं। इसी प्रकार सिनेमा और साहित्य में 'मैं' उस कड़ी का नाम हूँ जिसके बिन नायक की कल्पना करना दूध में नीबू निचोड़ने के बराबर है। कोई और नहीं बल्कि खलनायक हूँ 'मैं'।

सिनेमा और साहित्य ही क्यों मैं तो सभी की रियल लाइफ़ में भी होता हूँ क्योंकि लोग चाहे मुझसे कितनी भी नफ़रत करें मैं उनकी लाइफ़ में होता ही हूँ। मैं यानि खलनायक ही स्टोरी को आगे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हूँ और मेरे ही दम पर स्टोरी ज़िन्दा रहती है, मेरे अभाव में स्टोरी की हालत बिन जल की मछली की तरह हो जाती है ये कहना ग़लत नहीं होगा कि मेरे ही कारण स्टोरी का जन्म होता है एवं मेरी मौत के साथ स्टोरी की भी मौत हो जाती है।स्टोरी के जीवन और मौत का यह सबसे प्रमुख सिद्धान्त साहित्य और सिनेमा दोनों में बराबर लागू होता है।

इस सिद्धान्त का एक अच्छा उदाहरण हैरी पाॅटर सीरीज़ के पहले उपन्यास का पहला भाग और फ़िल्म का प्रथम दृश्य है जिसमें एक बच्चे को तीन लोग उसकी आंटी के घर छोड़ने आते हैं क्योंकि वह बच्चा वोल्डेमार्ट के हाथों मरते-मरते बचा होता है। वोल्डेमार्ट कोई और नहीं बल्कि मैं ही होता हूँ जिससे हैरी को महफ़ूज़ रखा जाने का पूरा प्रयास होता है और मेरे ही कारण हैरी से मोहब्बत करने वाले उसके लिए अपनी ज़िन्दगी क़ुर्बान करते जाते हैं लेकिन फ़िल्म और उपन्यास की कहानी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता बल्कि दिलचस्पी में और ज़्यादा बढोत्तरी होती है कि अब हैरी का सामना मुझसे होगा। स्टोरी का 'द एन्ड' भी तब होता है जब हैरी मुझे खत्म कर देता है। स्टोरी का जन्म मेरे साथ होता है और मेरी मौत के साथ स्टोरी की मौत हो जाती है।

मेरा हाल फ़िल्म 'जानी दुश्मन' की रूह जैसा है जो शरीर बदलती रहती है इसी प्रकार मैं भी कभी सुख्खी लाला तो कभी गब्बर सिंह, कभी मोगैम्बो या शाकाल, डा.डैंग, कात्या, जगीरा, डांग, कैप्टन रसल, ग़ज़नी और कभी रामाधीर सिंह या जयकान्त शिकरे आदि का रूप लेकर सामने आता रहता हूँ और भविष्य में भी इसी प्रकार के रूप लेकर आता रहूंगा।

Thursday, July 9, 2015

वाटर की बात

दीपा मेहता की फ़िल्म 'वाटर' न सिर्फ कला फ़िल्म का बेहतरीन उदाहरण है बल्कि यह पुरज़ोर तरीक़े से समाज के उन पहलुओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है जिन पहलुओं की ओर हमारा ध्यान बहुत मुश्किल से जाता है।
वाटर में बहुत ही ख़ूबसूरत अंदाज से आज़ादी से पहले की विधवाओं की स्थिति को दिखाया गया है कि किस प्रकार उन्हें सादा से भी सादा जीवन जीने को मजबूर किया जाता था। फ़िल्म में इस पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि बूढी और ओहदेदार विधवा कैसे जवान विधवा के जिस्मों से धन का व्यापार करती है और जब वही विधवा विवाह की कल्पना करती है तो उसे माया और मोह के बारे मे वही बताती है जो उसे रात के अन्धेरे मे सेठों के पास भेजती थी।
दीपा मेहता ने शरीफ़ो की शराफ़त का भी भान्डाफ़ोड़ किया है कि दिन मे तो शरीफ़ होते है और रात मे...
इसी के साथ फ़िल्म में इस बात की ओर भी संकेत है कि अज्ञानता आज भी कितना बड़ा अभिशाप है। फ़िल्म में एक और बहुत ही ख़ास चीज़ को दिखाया गया है जो गाँधीजी की विचारधारा है जो सबको साथ लेकर चलना चाहती है। इन सबके साथ फ़िल्म यही बात कहती है कि आज भी महिलाओं की हालत क्या बहुत अच्छी है।
फ़िल्म की कहानी है आज़ादी के पहले की और फ़िल्म सामने आती है 2005 में जो साफ़तौर पर संदेश देती है कि महिलाओँ की स्थिति मे जितना सुधार हुआ है उससे और ज़्यादा होना चाहिए।